By 121 News
Chandigarh, Oct.03, 2026:-चंडीगढ़ कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता राजीव शर्मा ने अनिल मसीह के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की निंदा के बावजूद ढाई साल से कोई कार्रवाई न होने की कड़ी निंदा की है।
अनिल मसीह चंडीगढ़ नगर निगम के नामित पार्षद हैं। 30 जनवरी 2024 को मेयर चुनाव में उन्होंने सीसीटीवी पर साफ दिखने वाले तरीके से कांग्रेस-आप के संयुक्त उम्मीदवार के पक्ष में डाले गए आठ बैलट पेपर जानबूझकर खराब कर दिए थे। मसीह ने यह दुस्साहस भाजपा के कहने पर भाजपाई उम्मीदवार के पक्ष में चुनाव चुराने के लिए किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने इस अवैध नतीजे को रद्द कर सही विजेता घोषित किया। कोर्ट ने मसीह के इस काम को गंभीर अपराध बताया। साथ ही कोर्ट ने झूठा बयान देने पर धारा 340 सीआरपीसी के तहत कार्रवाई शुरू की और नगर निगम अधिनियम के तहत भी सजा का रास्ता खोला।
राजीव शर्मा ने आरोप लगाया कि 2024 की शुरुआत में चंडीगढ़ पुलिस में शिकायत दर्ज कराने और सुप्रीम कोर्ट के साफ आदेशों के बावजूद न तो अदालत ने और न ही किसी एजेंसी ने कोई कार्रवाई की। हाल ही की ऑडिट रिपोर्ट में भी इस देरी पर सवाल उठाया गया है। रिपोर्ट में पूछा गया है कि नगर निगम अधिनियम की धारा 33 के तहत कार्रवाई क्यों नहीं हुई और दोषी पाए गए पार्षद को पद पर क्यों रखा जा रहा है। नगर निगम का जवाब कि मामला ऊपरी अधिकारियों के पास लंबित है, साफ दिखाता है कि बीजेपी नियंत्रित व्यवस्था जानबूझकर मसीह को बचा रही है। इसके अलावा मसीह को दिए गए भत्तों ओर दूसरी सुविधाओं के चलते जो नगर निगम का नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई कौन करेगा।
राजीव शर्मा ने मोदी सरकार और गृह मंत्री अमित शाह के अधीन चंडीगढ़ प्रशासन को इस कानून की खुली अवहेलना के लिए पूरी तरह जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि बीजेपी ने एक बार फिर दिखाया है कि वह संविधान और न्यायपालिका की परवाह नहीं करती है। वह उस व्यक्ति को बचा रही है जिसने लोकतंत्र की हत्या करने की कोशिश की। ऐसा करके चंडीगढ़ नगर निगम, प्रशासन और बीजेपी सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की खुली अवमानना कर रहे हैं। बैलट चोर को बिना किसी सजा के सक्रिय पार्षद बने रहने दिया जा रहा है। यह चुनिंदा छूट बीजेपी का असली चेहरा दिखाती है कि कानून सिर्फ उनके विरोधियों के लिए है।
चंडीगढ़ कांग्रेस अनिल मसीह पर तुरंत मुकदमा चलाने, उन्हें नगर निगम से निकालने और यह स्पष्ट करने की मांग करती है कि बीजेपी शासन में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को केवल फाइलों तक सीमित क्यों कर दिया गया।
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