चंडीगढ़ प्रेस क्लब, सेक्टर 27 में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में पीडीएफए के प्रेसिडेंट दलजीत सिंह सदरपुरा ने कहा कि इन नियमों से पंजाब के 30,000 से अधिक डेयरी किसानों और 12,000 संगठित पीडीएफए फार्मों की रोज़ी-रोटी पर बुरा असर पड़ सकता है।
यह चेतावनी पीडीएफए की ओर से दी गई है कि हम इस ब्रीडिंग पॉलिसी को पंजाब में लागू नहीं होने देंगे। जब तक इस नीति को रद्द नहीं किया जाता, तब तक हम बड़े स्तर पर इसका विरोध करते रहेंगे।
सदरपुरा ने कहा कि पंजाब के डेयरी क्षेत्र को ऐसी नीतियों की जरूरत है जो किसानों की मदद करें, पशुओं की नस्ल में सुधार करें और दूध उत्पादन बढ़ाएं। लेकिन मौजूदा नियम किसानों के लिए बेवजह की पाबंदियां, कागजी कार्रवाई और अतिरिक्त खर्च पैदा कर रहे हैं।
एसोसिएशन ने नियमों को लेकर 9 बड़ी चिंताएं बताई हैं:
नियमों के अनुसार कृत्रिम गर्भाधान (आर्टिफिशल इनसेमिनेशन) का काम केवल पंजीकृत पशु चिकित्सक और अधिकृत आर्टिफिशल इनसेमिनेशन कर्मचारी ही कर सकेंगे, जिन्हें तय प्रशिक्षण लेना जरूरी होगा। पीडीएफए का कहना है कि इससे जमीनी स्थिति को ध्यान में नहीं रखा गया है। पशुओं में प्रजनन का काम मौसम के अनुसार बढ़ता-घटता है। पंजाब में पशु चिकित्सकों और प्रशिक्षित आर्टिफिशल इनसेमिनेशन कर्मचारियों की संख्या सीमित है। व्यस्त मौसम में ये कर्मचारी सभी किसानों की जरूरत पूरी नहीं कर पाएंगे। इससे पशुओं का समय पर गर्भाधान नहीं हो पाएगा, गर्भधारण की दर कम हो सकती है और किसानों को आर्थिक नुकसान हो सकता है।
नियमों में सर्टिफिकेट, संस्थान से ट्रेनिंग और रजिस्ट्रेशन जैसी शर्तें रखी गई हैं। पीडीएफए का कहना है कि इससे ऐसे अनुभवी स्थानीय आर्टिफिशल इनसेमिनेशन कर्मचारियों और किसानों को काम से बाहर किया जा सकता है, जिन्होंने केवल 10वीं कक्षा तक पढ़ाई की है लेकिन उन्हें कई वर्षों का व्यावहारिक अनुभव है। पीडीएफए का कहना है कि आर्टिफिशल इनसेमिनेशन का काम मुख्य रूप से व्यावहारिक और तकनीकी कौशल पर आधारित है। इसलिए इसे केवल शैक्षणिक योग्यता के आधार पर सीमित नहीं किया जाना चाहिए।
एसोसिएशन ने सीमन (वीर्य) को रखने और अपने पास रखने पर लगाई गई सीमाओं, खासकर 50 स्ट्रॉ की सीमा, पर आपत्ति जताई है। पीडीएफए के अनुसार, लगभग 100 गायों वाले फार्म को सालभर में अपने प्रजनन चक्र को बनाए रखने के लिए कम से कम 300 सीमन स्ट्रॉ की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे में 50 स्ट्रॉ की सीमा आधुनिक डेयरी फार्मों की वास्तविक जरूरत के हिसाब से बहुत कम है। इससे किसानों पर बेवजह कानूनी कार्रवाई का खतरा भी बढ़ सकता है।
पीडीएफए ने सीमन रखने वाले कंटेनरों और लिक्विड नाइट्रोजन के भंडारण से जुड़े सख्त नियमों पर भी चिंता जताई है। पीडीएफए के अनुसार, 10 लीटर जैसे छोटे टैंक में लिक्विड नाइट्रोजन जल्दी खत्म हो सकता है और उसकी बार-बार निगरानी करनी पड़ती है। अगर लिक्विड नाइट्रोजन कम होने का समय पर पता नहीं चला तो महंगा सीमन खराब हो सकता है और फार्म का प्रजनन कार्यक्रम प्रभावित हो सकता है।
हर सीमन स्ट्रॉ की बिक्री या इस्तेमाल का रिकॉर्ड रखना और इसकी जानकारी बैंकों व सरकारी अधिकारियों को देना किसानों और AI कर्मचारियों के लिए अतिरिक्त काम बढ़ाएगा। पीडीएफए का कहना है कि इस तरह का रिकॉर्ड और डेटा संभालने का काम सरकार के पशु चिकित्सा और पशुपालन विभाग के सिस्टम के माध्यम से होना चाहिए, न कि किसानों पर इसका अतिरिक्त बोझ डाला जाना चाहिए।
पीडीएफए ने उन प्रावधानों का कड़ा विरोध किया है जिनके तहत अधिकारियों को कंटेनरों को अवैध घोषित करने और सामग्री को जब्त या नष्ट करने की शक्ति मिल सकती है। सदरपुरा ने कहा कि अगर अधिकारियों को महंगी प्रजनन सामग्री पर बहुत ज्यादा अधिकार दे दिए गए, तो छोटी-मोटी कागजी या नियमों से जुड़ी गलतियों के नाम पर किसानों को परेशान करने और भ्रष्टाचार की संभावना बढ़ सकती है।
एसोसिएशन का कहना है कि एम्बुर्यो प्रोडक्शन सेंटरज शुरू करने और एम्बुर्यो ट्रांसफर के लिए हर साल लगने वाली फीस काफी ज्यादा है। इससे निजी पशुपालक और ब्रीडर आधुनिक आनुवंशिक तकनीक अपनाने से पीछे हट सकते हैं।
पीडीएफए का कहना है कि पंजाब सरकार को ऐसी तकनीक महंगी बनाने के बजाय एम्बुर्यो ट्रांसफर टेक्नोलॉजी (ईटीटी) को बढ़ावा देना चाहिए, क्योंकि इससे पशुओं की नस्ल में तेजी से सुधार किया जा सकता है।
पीडीएफए ने सीमन स्टेशनों के लिए प्रस्तावित फीस का भी विरोध किया है। एसोसिएशन के अनुसार, 50 प्रोडक्शन बुल्स तक की क्षमता वाले केंद्र के लिए 5 लाख रुपये की फीस रखी गई है। इसके अलावा क्षमता बढ़ने पर अतिरिक्त शुल्क भी देना होगा। पीडीएफए का कहना है कि इतनी ज्यादा शुरुआती लागत से नए सीमन स्टेशन और नई सुविधाएं शुरू करने में लोगों की रुचि कम हो सकती है। इससे प्रतियोगिता घटेगी और किसानों के लिए सीमन स्ट्रॉ की कीमत बढ़ सकती है।
पंजाब में जितना भी नस्ल सुधार हुआ है, उसमें गायों की नस्ल सुधारने में मुख्य भूमिका विदेशों, यानी दूसरे देशों से मंगाए गए सीमन या वीर्य और सीमन स्ट्रॉ की रही है।
जब यह सीमन विदेशों से आयात किया जाता है, तो यह भारत सरकार के पशुपालन विभाग की कठिन और विस्तृत प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद ही स्वीकृत होता है। इसके लिए लाइसेंस और परमिट जारी किए जाते हैं और उसके बाद ही इसे भारत में आयात किया जा सकता है।
लेकिन इस नीति में कहा गया है कि जब सीमन विदेशों से मंगाया जाएगा, तो पंजाब सरकार की पशुपालन अथॉरिटी भी दोबारा इसकी समीक्षा करेगी। यह व्यवस्था पूरी तरह गलत है।
इससे प्रक्रिया में अनावश्यक दोहराव होगा और भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा मिल सकता है। जब सीमन पहले ही भारत सरकार की पूरी प्रक्रिया से गुजरकर स्वीकृत हो चुका है और आयात किया जा चुका है, तो पंजाब सरकार द्वारा इसकी दोबारा समीक्षा करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
इस तरह की दोहरी प्रक्रिया अनावश्यक रुकावटें पैदा करेगी, जिससे नस्ल सुधार के कार्य में बड़ी बाधा आएगी। हम इस व्यवस्था का पूरी तरह विरोध करते हैं।
