By 121 News
Chandigarh, June 20, 2026:-प्राचीन कला केन्द्र द्वारा अपने संस्थापक स्वर्गीय मदन लाल कौसर (गुरु एम.एल. कौसर) की 96वीं जयंती के उपलक्ष्य में 20 जून को सायं 6:30 बजे पंजाब कला भवन के डॉ. एम.एस. रंधावा सभागार में ग़ज़लों से सजी एक विशेष संगीतमय संध्या का आयोजन किया गया।
गुरु एम.एल. कौसर ने प्राचीन कला केन्द्र जैसी प्रतिष्ठित सांस्कृतिक संस्था की स्थापना कर भारतीय शास्त्रीय कलाओं और कलाकारों को एक सशक्त मंच प्रदान किया। अपने दूरदर्शी नेतृत्व, समर्पण और कला-साधना के माध्यम से उन्होंने कला जगत में एक विशिष्ट पहचान स्थापित की। उनकी 96वीं जयंती के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम में केन्द्र की रजिस्ट्रार एवं कथक गुरु डॉ. शोभा कौसर, सचिव सजल कौसर तथा केन्द्र से जुड़े अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।
इस अवसर पर अंबाला की प्रसिद्ध ग़ज़ल गायिका निधि नारंग ने अपनी मधुर एवं भावपूर्ण प्रस्तुति से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। आकाशवाणी और दूरदर्शन की ग्रेडेड कलाकार निधि नारंग ने गुरु यशपाल शर्मा के सान्निध्य में संगीत की शिक्षा प्राप्त की है और अपनी सशक्त गायकी से संगीत जगत में विशिष्ट पहचान बनाई है।
कार्यक्रम का आरम्भ गुरु एम.एल. कौसर को पारम्परिक श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ हुआ। इसके पश्चात निधि नारंग ने ग़ज़ल "आँख जब बंद..." से अपनी प्रस्तुति की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने "रेत पे लिख के..." तथा "सावन रुत..." जैसी ग़ज़लें प्रस्तुत कर श्रोताओं की भरपूर सराहना प्राप्त की।
उन्होंने आगे बढ़ते हुए लोकप्रिय ग़ज़ल "प्यार का पहला ख़त..." प्रस्तुत की, जिस पर दर्शकों ने जोरदार तालियों से उनका उत्साहवर्धन किया। अपनी जादुई आवाज़ में उन्होंने "रफ़्ता-रफ़्ता..." और "हमारी साँसों में..." जैसी मशहूर ग़ज़लें भी सुनाईं, जिन्होंने श्रोताओं के दिलों को छू लिया।
कार्यक्रम के दौरान निधि नारंग ने "कौन कहता है...", "सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब...", "यूँ न मुझसे नज़र...", "दिलों में अगर...", "मुद्दतों बाद..." और "ऐसा लगता है..." जैसी कई भावपूर्ण ग़ज़लों की प्रस्तुति देकर माहौल को सुरमयी बना दिया। कार्यक्रम के अंतिम चरण में उन्होंने कालजयी ग़ज़ल "आज जाने की ज़िद न करो" प्रस्तुत की, जिसके साथ पूरा सभागार संगीत के जादू में डूबा दिखाई दिया। समापन पर उन्होंने कुछ सुंदर बंदिशें भी प्रस्तुत कीं, जिन्हें श्रोताओं ने खूब सराहा।
इस प्रस्तुति में उनके साथ अमजद खान ने तबले पर, नफ़ीस अहमद खान ने हारमोनियम पर तथा सुभान अली ने सारंगी पर उत्कृष्ट संगत कर कार्यक्रम की गरिमा को और बढ़ाया।
कार्यक्रम के अंत में प्राचीन कला केन्द्र की रजिस्ट्रार डॉ. शोभा कौसर एवं सचिव सजल कौसर ने कलाकारों को उत्तरीय एवं स्मृति-चिह्न भेंट कर सम्मानित किया तथा उनकी उत्कृष्ट प्रस्तुति के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया।
यह संगीतमय संध्या गुरु एम.एल. कौसर को समर्पित एक भावपूर्ण श्रद्धांजलि सिद्ध हुई, जिसने उपस्थित श्रोताओं को ग़ज़लों की मधुर दुनिया में एक अविस्मरणीय यात्रा का अनुभव कराया।
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