Sunday, 1 November 2020

मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी से स्ट्रोक के मरीजों के उपचार की समय सीमा को 24 घंटे तक बढ़ाना संभव

By 121 News
Panchkula Nov. 01, 2020: ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी के अनुसार, भारत में सालाना स्ट्रोक के 1.29 मिलियन नए मामले सामने आ रहे हैं और 2014 के बाद से इनमें 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई। हाल ही में जारी की गई इस स्टडी की फाइनल रिपोर्ट के अनुसार स्ट्रोक भी देश में होने वाली मौतों का तीसरा सबसे बड़ा कारण है। 
मेडिकल विशेषज्ञों और डॉक्टरों ने बड़े पैमाने पर उच्च प्रसार और रोग प्रसार दर को सामान्य आबादी के बीच जागरूकता की कमी के जोड़ा है। उनका कहना है कि स्ट्रोक  के प्रसार की दर को कम करने के साथ ही मैकेनिकल थ्रॉम्बेक्टोमी जैसी नई तकनीकों के बारे में सीमित जोखिम के बारे में लोगों को जागरूक करने की जरूरत है। इस संबंध में लोगों में जानकारी और नॉलेज का जो अभाव है, उसे दूर कर भी अधिक से अधिक मरीजों की जान बचाई जा सकती है। 
डॉ.विवेक गुप्ता, एसोसिएट डायरेक्टर और हेड-इंटरवेंशनल न्यूरोरेडियोलॉजी, पारस हॉस्पिटल्स, पंचकूला ने कहा कि हालांकि, मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी दुनिया भर में स्ट्रोक के लिए उपलब्ध सबसे सफल इलाज है, लेकिन देश में शायद ही किसी को इसके बारे में पता हो। लोगों को हार्ट अटैक और स्टेंटिंग के बारे में पता है लेकिन बहुत कम आबादी को ब्रेन स्ट्रोक और थ्रोम्बेक्टोमी के बारे में जानकारी है। स्ट्रोक के रोगियों में आजीवन विकलांगता से बचने के लिए इस उपचार के बारे में जनता में जागरूकता फैलाने के लिए व्यक्तिगत और सरकारी स्तर पर हर संभव प्रयास करना होगा। ये काम जितनी जल्दी होगा, उतना अधिक लोगों की जान बचेगी।
मैकेनिकल थ्रॉम्बेक्टोमी एक प्रकार की मिनिमली-इनवेसिव प्रक्रिया है जिसमें मस्तिष्क में किसी रोगी की धमनी से थक्का हटाने के लिए विशिष्ट चिकित्सा उपकरण जैसे स्टेंट रिट्रीजर और कैथेटर का उपयोग किया जाता है। कैथलैब गाइडेंस का उपयोग करते हुए, डॉक्टर इन उपकरणों को रोगी की धमनियों के माध्यम से थक्के तक पहुंचाता है और उसे हटाकर रक्त प्रवाह को सुचारू करता है। 
डॉ.गुप्ता ने कहा कि मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी बहुत प्रभावी है और अवरुद्ध धमनियों को फिर से खोलने में इसकी सफलता की दर 90 प्रतिशत से अधिक है। जो मरीज स्ट्रोक के बाद जितना जल्दी अस्पताल में लाए जाते हैं, उनको उतना बेहतर परिणाम प्राप्त होगा।
मरीज को सही उपचार मिलने की जरूरत में देरी से प्रति मिनट लगभग 20 लाख मस्तिष्क कोशिकाओं (ब्रेन सेल) का नुकसान होता है। यह वह जगह है जहां एडवांस्ड तकनीकों और मेडिकल प्रोसीजर्स जैसे कि मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी ने प्रमाणित परिणाम और उच्च सफलता दर प्रदर्शित की है। इतना ही नहीं, यह ट्रीटमेंट विंडो यानि मरीज को उपचार मिलने की समय संभावना को 24 घंटे तक बढ़ाता है। इसके सफलता की दर को विभिन्न रोगों में चिकित्सा प्रक्रियाओं में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
हालांकि, मैकेनिकल थ्रॉम्बेक्टोमी के संबंध में आज देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती नई टेक्नोलॉजी को काफी धीरे धीरे अपनाने की है। यह तब आश्चर्य की बात नहीं है, कि भारत में एक्यूट इस्केमिक स्ट्रोक के जिन 11000 रोगियों का उपचार किया गया, उनमें से केवल 10 प्रतिशत को ही उपचार के विकल्प के रूप में मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी प्रोसीजर्स प्राप्त हुआ है। 

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